जीते-जी उपेक्षा मरने के बाद पद्मश्री; वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश शर्मा ने मरणोपरांत पद्म सम्मान पर उठाए सवाल

भारत सरकार द्वारा घोषित किए गए पद्म सम्मान में गुमनामी में रह कर उत्कृष्ट कार्य करने वाली विभूतियों के चयन की प्रशंसा हो रही है, लेकिन जिन्हें पद्म सम्मान के लायक समझा गया उनमें से कुछ दिवंगत लोगों का जीते-जी सम्मान न होने का दर्द भी उभरा है। एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश शर्मा ने ट्वीट कर इस स्थिति पर क्षोभ जताया है। शर्मा ने ट्वीट किया- आइंस्टाइन के सिद्धांत को चुनौती देने वाले बिहार के गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह जीते-जी उपेक्षा के पात्र रहे। मरने पर उनका शव घंटों पड़ा रहा। अब मरणोपरांत पद्मश्री देकर व्यवस्था ने भूल सुधार करने का प्रयास किया है। परंतु ऐसे सैंकड़ों वशिष्ठ नारायण आज भी गुमनामी के अंधेरे में होंगे। इस बार किसी को भारत रत्न नहीं। अरुण जेटली, जॉर्ज फ़र्नांडिस, सुषमा स्वराज और पेजावर पीठ के स्वामी विश्वेश्वरतीर्थ को मरणोपरांत पद्मविभूषण। पंडित छन्नूलाल मिश्र और एमसी मैरीकॉम को भी पद्मविभूषण।मोदी सरकार में यह सकारात्मक बदलाव अवश्य आया है कि पद्म सम्मान जुगाड़ुओं के बजाए अधिकांश ऐसे लोगों को मिलने लगा है जो वाकई इसके हक़दार हैं। लेकिन मरणोपरांत सम्मान देना बंद होना चाहिए। जिस इंसान की आप जीतेजी क़द्र न कर पाए उसे मरने के बाद सम्मान देकर क्या कीजिएगा।

एक नजरिया ये भी-
शर्मा ने ट्वीट किया कि सीएए का समर्थन करने वाले उद्योगपति आनंद महिन्द्रा और जम्मू कश्मीर नीति पर सरकार का समर्थन करने वाले पीडीपी नेता मुजफ्फर बेग को पद्म भूषण। सरकार का समर्थन करने वाले अदनान सामी और कंगना रनौत को पद्मश्री।
क़िस्मत हो तो अदनान सामी जैसी। भारत की नागरिकता भी पा गए और भारत का नागरिक सम्मान भी। शायद ये दोनों चीज़ें हासिल करने वाले वे पहले पाकिस्तानी हों। उनके योगदान पर बहस हो सकती है। हो सकता है उन्हें अपना वजन कम करने के लिए ही सम्मानित कर दिया गया हो।
अटकल थी कि इस बार विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न दिया जा सकता है। ऐसा होने पर शिवसेना और कॉंग्रेस आमने-सामने आ सकते थे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। शायद इसे बाद के लिए बचा लिया गया।

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